उत्तराखंड की शांत वादियों में पसरता अपराध
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सुदीप पंचभैया ।
उत्तराखंड की शांत वादियों में अपराध तेजी से पसर ही नहीं रहा है, बल्कि पहचान के साथ भी जुड़ने लगा है। कहा जा सकता है कि शांत वादियां अब अपराध के खोल से लिपट गई हैं। राजधानी देहरादून से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में हुई घटनाएं इस बात का प्रमाण है।
राजधानी देहरादून की स्वास्थ्य वर्धक आबोहवा अब प्रदूषित हो चुकी है। प्रदूषण के साथ-साथ अपराध से भी। अब यहां पहले जैसी शांति नहीं रही। अपराध ने यहां अच्छे से पांव पसार लिए हैं। अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। अपराधी पुलिस का एक तरह से चुनौती देने वाले अंदाज में काम कर रहे हैं।
राज्य गठन के बाद देहरादून में अपराध की इस तरह से एंट्री हुई जैसे ये नए राज्य के लिए अनिवार्य हो। देश के नामी गिरामी अपराधियों की दून में मौजूदगी की बातें खूब सामने आती रही हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपराध कर अपराधी छिपने के लिए उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों का उपयोग करते रहे हैं। कई बार मामले खुले भी और कई बार अपराधी आराम करके लौट भी गए।
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पिछले कुछ सालों से तो दूसरे राज्यों में अपराधों में शामिल रहे लोग उत्तराखंड में खनन, जमीन, रियल स्टेट के कार्य भी करने लगे। इन कामों में उनकी हनक और खनक की भी अक्सर खूब चर्चाएं होती रही हैं।
कहा जा सकता है कि खनन और जमीन के मामलों में बाहर के अपराधियों का अच्छा खासा दखल भी हो गया है। कइयों की तो सत्ता से नजदीकी की बातें भी सामने आती रही हैं। दरअसल, अपराधियों, माफिया, नशे के कारोबारियों को उत्तराखंड सबसे सुरक्षित लगने लगा है।
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यहां या यहां से वो अपना कारोबार को देश के विभिन्न क्षेत्रों में अच्छे से ऑपरेट कर रहे हैं। यही नहीं उनके रहन/सहन, महंगी गाड़ियों और तौर तरीकों से कई नेता भी इंप्रेस बताए जा रहे हैं। कुछ उनके तौर तरीकों को फॉलो भी कर रहे हैं। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अब अपराध का लोकल ब्रांड भी दिखने लगा है।
बहरहाल, गैंगस्टर विक्रम इसका प्रमाण है। विक्रम की अज्ञात हमलावरों ने सिल्वर सिटी मॉल में गोली मारकर हत्या कर दी। हमलावरों ने विक्रम को कमर में ठूंसे गए रिवाल्वर निकालने का मौका भी नहीं दिया। यानि हमलावर प्रोफेशनल थे और पुलिस की पहुंच से दूर हैं। पुलिस की प्रारंभिक जांच में ये बात सामने आ रही है कि विक्रम पर झारखंड में कई मामले दर्ज हैं। विक्रम झारखंड में बड़े-बड़े अपराध कर देहरादून में आराम से रह रहा था।
हर किसी के पुलिस वैरीफिकेशन की बात करने वाले सिस्टम ने विक्रम का भी वैरीफिकेशन किया होगा। यदि वैरीफिकेशन हुआ है तो सारी बातेें सामने भी आई होंगी। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर विक्रम यहां कारोबार कैसे कर रहा था। क्या विक्रम को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा था। ये तमाम सवाल लोगांे के मन में हैं।
देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर क्षेत्र में बढ़ते अपराध सामने आ रहे हैं। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में भी स्थिति जुदा नहीं है। ये बात सच है कि अभी पुलिस रिकॉर्ड में पर्वतीय क्षेत्र शांत वादियां हैं। मगर, जमीनों की खरीद फरोख्त, खनन और बड़े ठेकों का खेल पर्वतीय क्षेत्रों में भी अपराध की शुरूआत है। अभी अपराध विजिवल नहीं है। इस पर लोकल स्तर पर रिएक्ट होते ही अपराध को विजिवल होते देर नहीं लगेगी।
अन्य राज्यों के नंबर वाली महंगी-महंगी गाड़ियों के ब्रांच रूट पर सरपट काटने से आम लोग भौचक्क हैं। यकीन मानिए ये अपराध के लिए पिच तैयार होने जैसा है। व्यवस्था को इस पर गौर करना चाहिए। मूल निवास 1950 को सख्ती से लागू करना होगा। पिछले 20 सालों में जमीनों की हुई खरीद फरोख्त की समीक्षा होनी चाहिए। वोट के चक्कर में उत्तराखंड को खाला का घर नहीं बनाया जाना चाहिए। राज्य में पनप चुके अपराध के पीछे वोट की राजनीति ही है।

