उत्तराखंड

उत्तराखंडः विधायिका में हर स्तर पर गंभीरता का अभाव

  • सुदीप पंचभैया

    लोकतंत्र में विधायिका सबसे अधिक पावरफुल होती है। विधायिका को ताकत जनता से मिलती है। इस ताकत का उपयोग विधायिका को कल्याणकारी शासन स्थापित करने में करना होता है। लोकतंत्र में अब ये आदर्श व्यवस्था तेजी से छीज रही है। कम से कम उत्तराखंड राज्य के बारे में तो यकीन के साथ ऐसा कहा जा सकता है। यहां विधायिका में गंभीरता का अभाव साफ झलकता है।इन दिनों गैरसैंण में चल रहे विधानसभा सत्र में जो कुछ दिखा,वो चिंताजनक है।

    25 साल के उत्तराखंड की राजनीतिक व्यवस्था में जो कुछ देखने और सुनने को मिल रहा है उससे राज्य की बेहतरी की उम्मीद अब धुंधलाने लगी है। दरअसल, राजनीतिक व्यवस्था में गंभीरता दूर-दूर तक नहीं दिखती। गंभीरता का न दिखना इस बात का प्रमाण है कि विधायिका आदर्श स्थितियों से भटक गई है। उत्तराखंड इसका खामियाजा कई तरह से भुगत रहा है। विधायिका में गंभीरता का अभाव कार्यपालिका की कार्यप्रणाली में साफ-साफ दिखता है।

    जिस प्रकार की राजनीति हावी हो रही है उसमें राज करने की गरज तो दिखती है। मगर, जनकल्याण की नीति दूर हो रही है। राजनीति के माध्यम से जन सेवा का भाव अब दूर-दूर तक नहीं रह गया है। राजनीति विशुद्ध रूप से प्रोफेश बन गई है। इसमें त्याग और निष्पक्षता का भाव सिरे से गायब हो गया है। पद धारण करते वक्त ली जाने वाली शपथ अब जनता का मुंह चिढ़ाती है।

    क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष दोनों अपनी बातों/ तर्कों पर जोर देते हैं। देश की सबसे बड़ी पंचायत यानि संसद और राज्यों की पंचायत विधानसभा में हो हल्ला और मीडिया के माध्यम से अपने पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास होता है। इससे आम जन में भ्रम पैदा हो जाता है। इसका लाभ राजनीतिक दल उठा रहे हैं और आम जन के हिस्से महंगाई, बेरोजगारी और भाई भतीजावाद से प्रभावित होना आता है।

    इन दिनों गैरसैंण में उत्तराखंड विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है। सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चली तू तड़ाक, भ्रष्टाचारर के स्पष्ट आरोप-प्रत्यारोपों ने बहुत कुछ बयां कर दिया। हालांकि इसे चुनावी साल का इंपेक्ट माना जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष पर इसका दबाव साफ-साफ दिख रहा है।

    ऐसा लगा जैसे विपक्ष मित्र विपक्ष के खोल से बाहर आना चाहता हो और सत्ता पक्ष सब कुछ अपने हिसाब से करना चाहता है। सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों तक विधानसभा में अपने माननीयों की एक-एक बात पहुंच रही है। समर्थक इसे जनता के बीच अलग तरीके से परोस रहे हैं।

    हद तो ये है कि राज्य सरकार के मंत्री गैरसैंण के विधानसभा भवन को वेडिंग डेस्टिनेंशन और कॉरपोरेट डेस्टिनेशन बनाने की बात तक करने लगे हैं। जिस गैरसैंण को राज्य के लिए चले आंदोलन में लोगों में राज्य की राजधानी के रूप में देखा हो उसके बारे में सरकार के मंत्री की ऐसी भावना लोगांे के मन पर चोट जैसी है।

    ये बात अलग है कि अब मंत्री कह रहे हैं कि उनकी बात को तोड़ मोड़कर बताया जा रहा है। निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में नेताओं की कई बातें लोगों को आज भी परेशान करती हैं। विधानसभा सत्र के बारे में लोग जो कुछ सुन रहे और सोशल मीडिया में देख रहे है उससे लोग हैरान परेशान हैं।

    लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि अच्छी खासी साक्षरता वाले उत्तराखंड में राजनीतिक व्यवस्था में साक्षरता क्यों नहीं झलक रही है। आखिर उत्तराखंड राज्य की राजनीतिक व्यवस्था में गंभीरता का अभाव क्यों दिख रहा है। क्यों उत्तराखंड का सत्ता पक्ष और विपक्ष लोगों को ऑल इज वेल का संदेश देने में असफल रहे हैं। इस बात को अब लोग अच्छे से महसूस कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *