उत्तराखंड

देश का भरोसा खो रहा प्राइवेट सेक्टर

सुदीप पंचभैया।

भारत में प्राइवेट सेक्टर देश के लोगों का भरोसा खो रहा है। विमानन कंपनी इंडिगो का हाल का प्रकरण इस बात का प्रमाण है। हवाई क्षेत्र ही नहीं देश के कई प्राइवेट सेक्टर अब एकाधिकार की स्थिति में आकर सिस्टम को आंखे दिखाने लगे हैं।

देश के लोग कभी इंस्पेक्टर राज से त्रस्त थे। इंस्पेक्टर राज के कई किस्से भी घर गांवों में सुनने को मिलते हैं। 1991 में खुली बाजार व्यवस्था लागू होने से लोगों को इंस्पेक्टर राज से मुक्ति मिली। लोगों को ये काफी रास आया। मगर, तीन दशक में ही प्राइवेट सेक्टर भी लोगों को अखरने लगा है। वजह साफ है कि प्राइवेट सेक्टर सिस्टम पर ही हावी होने लगा है। कहा जाने लगा है कि प्राइवेट की लूट तो इंस्पेक्टर राज से खतरनाक है।

इंस्पेक्टर के कहर से तो सरकार बचा लेती थी। मगर, प्राइवेट सेक्टर की मनमानी के सामने सरकार नतमस्तक नजर आ रही है। इसे अपने आस-पास महसूस किया जा सकता है। हाल ही में विमानन कंपनी इंडिगो ने देश के साथ जो मजाक किया वो किसी से छिपा नहीं है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ये इंस्पेक्टर राज से खतरनाक है। देश के लोग हवाई अडडों पर कैद होकर रह गए। कहीं कोई खुनवाई नहीं। दुनिया में देश की खूब किरकिरी हुई।

नागरिक उडडयन मंत्रालय कुछ भी नहीं कर सका। आगे भी कुछ कर सकेगा इसकी संभावना ना के बराबर हैं। ये बात सामने आ रही है कि देश की हवाई सेवाओं के 65 प्रतिशत हिस्से पर काबिज इंडिगो को डीजीसीए के एफडीटीएल से संबंधित आदेश नागवार गुजरे। इंडिगो ने दो साल से इस पर अमल नहीं किया। डीजीसीए ने भी इसकी मॉनिटरिंग नहीं की। जब डेट निकलने लगी तो इंडिगो ने बगैर पायलटों और अन्य स्टॉफ की भर्ती के एफडीटीएल को फॉलो करने का उपक्रम किया। परिणाम देश की हवाई यात्रा की गति थम गई। इससे देश में कोहराम मच गया।

इतना कुछ होने के बावजूद इंडिगो प्रबंधन आराम से है। कारण उसका हवाई कारोबार पर उसका एकाधिकार है। सरकार सिविन एविएशन सेक्टर से मुक्त हो चुकी है। देश मंे ऐसा सिर्फ हवाई क्षेत्र में ही नहीं है। टेलीकॉम क्षेत्र में भी कंपनियों का एकाधिकार हो गया है। ये सेक्टर जनता की चुप्पी से खूब फल फूल रहा है।

देश में कारोबार के अधिकांश क्षेत्रों में ऐसा ही देखने को मिल रहा है। मेडिकल और एजुकेशन (स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी, मेडिकल और इंजीनियरिंग) का हाल भी यही है। जल्द ही उक्त दोनों सेक्टरों में भी इंडिगो जैसे हालात पैदा हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। चिकित्सा और शिक्षा की महंगाई से लोगों का दम निकलने लगा है। स्कूलों की फीस और हॉस्पिटल की बिल ने लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

खास बात ये है कि प्राइवेट स्कूल/कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेजों का विकास सरकारी स्कूल/ कॉलेजों सरकारी हॉस्पिटलों को लेकर भ्रम और नकारात्मक बातें फैलाकर हो रहा है। समाज भी बाजार प्रायोजित भ्रम की जद में आ रहा है। परिणाम सरकारी स्कूल/ कॉलेज और हॉस्पिटल बंदी की कगार पर हैं। सरकारों का रवैया भी इसको लेकर ठीक नहीं है।

हालात ये हो गए हैं कि प्राइवेट सेक्टर एकाधिकार प्राप्त कर सिस्टम को आंखे दिखाने लगते हैं। सिस्टम पर प्राइवेट सेक्टर का असर साफ-साफ दिखता है। केंद्र, राज्य और छोटी सरकारों के स्तर से होने वाले तमाम कार्यों में ऐसा देखा और महसूस किया जा सकता है।

सत्ताधीशों को ये समझना ही होगा कि सरकार की पहचान कभी भी प्राइवेट सेक्टर से नहीं हो सकती है। प्राइवेट सेक्टर कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकते। कल्याणकारी तत्व सरकार में ही निहीत हो सकता है कारोबार में नहीं। कारोबार के केंद्र में मुनाफा होता है और मुनाफे के खेल में जनकल्याण की कोई भावना नहीं होती।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैंं।

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