उत्तराखंड

सुविधा की राजनीति और हकीकत से डरते राजनेता

सुदीप पंचभैया।

भारत में सुविधा की राजनीति चरम पर पहुंच गई है और राजनेता हकीकत से डरने लगे हैं। राजनीतिक व्यवस्था में इसे साफ-साफ देखा जा सकता है। इसका असर भारतीय समाज पर कई तरह से दिख रहा है। आबादी और खासकर युवाओं की असीम ऊर्जा का उपयोग देश की बेहतरी में नहीं हो पा रहा है।

भारतीय राजनीति में सुविधा की संस्कृति आजादी के साथ ही पनपने लगी थी। अंग्रेजों ने देश के दो टुकड़े कर इसका सूत्रपात किया। इसके बाद के कालखंड पर नजर डालें तो भारतीय राजनीति की रेल सुविधाओं की पटरी पर स्थायी तौर चढ़ गई। अब स्थिति ये है कि देश में सिर्फ और सिर्फ सुविधा की राजनीति हो रही है।

जिस वक्त देश को एक सूत्र में पिरोने की जरूरत थी, तब राजनेताओं ने देश के जन को समझाने के बजाए सुविधा का रास्ता अख्तियार किया। देश के मन को व्यापक बनाने के प्रयास ही नहीं हुए। लोगों को एक दायरे में ही सोचने को मजबूर किया गया। हालात ये हो गए हैं कि देश में हर धर्म, हर जाति, हर वर्ग को अपने साथ अन्याय होता दिख रहा है।

सबके पास अपने-अपने तर्क भी हैं। सबकी बातों और सबके तर्कों को मान्यता देने वाली राजनीति भी है। ये सब व्यापक हितों के साथ समझौत करते हुए हो रहा है। यही अब देश के लिए चिंता की बात बनने लगी है। समाज और लोग इतने बंट चुके हैं कि किसी सुधार के लिए सबका एक होना मुश्किल दिखता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों के मुददे बिलकुल जुदा तरीके से आकार लेने लगे। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में बहुत कुछ ऐसा दिख जाएगा जो, आजादी के 80 सालों के बाद अखर रहा है। ये सब सुविधा की राजनीति की वजह से हो रहा है। सामाजिक तानाबाना भी ऐसा ही बन चला है। सामाजिक सुधारों में बड़ी-बड़ी बातें हुई। मगर, देश के संदर्भ में सामाजिक संगठन भी बंटे हुए दिखे।

व्यापक सुधार वाले मुददों को छेड़ा ही नहीं गया। सामाजिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बातें भी कहीं न कहीं किसी राजनीति को एड्रेस करती दिख रही हैं। अब तो हालात ये हैं कि राजनेता हकीकत डरने लगे हैं। वो वास्तविक मुददों को छेड़ने का साहस नहीं कर पाते। वोट साध सकने वाले मुददों के लिए राजनीतिक दल हद से गुजर जाते हैं। स्थिति ये हो गई है कि वोट और मुददे देश के लिए व्युत्क्रमानुपाती हो गए हैं। जबकि मुददों को वोट का अनुक्रमानुपाती होना चाहिए। मगर, ऐसा देश की राजनीति में दूर-दूर तक नहीं हो रहा है।

राजनीतिक दलों की राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात पर अब लोग संदेह करने लगे हैं। पिछले पांच दशकों की राजनीति में लोगों ने इसे देखा भी और महसूस भी खूब किया। सरकारें भी बदली। भरोसे दिलाने वाले राजनीतिक दलों का सरकार मंे आने के बाद रवैया पहले वालों से कतई अलग नहीं दिखा।

बस मुददों की ब्र्रांडिग अपने-अपने हिसाब से की गई। इससे लोगों को इंप्रेस किया गया। जागरूक लोगों को हर नेता और हर सरकार की हकीकत को समझते देर नहीं लगी।

लेखक-वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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