भारत में शिक्षा का व्यावसायीकरण
सुदीप पंचभैया।
गुरू की महिमा और गुरूकुल के महत्व को समझने वाले देश में अब शिक्षा बाजार की वस्तु बन गई है। शिक्षा को माल की तरह परोसा जा रहा है और छात्र/अभिभावक इसके उपभोक्ता बन गए हैं। आए दिन बाजारी शिक्षा में बहुत सी बातें सुनी और देखी जा रही हैं।
ताजा मामला ग्रेटर नोयडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी का है। भारत मंडपम में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में यूनिवर्सिटी ने एक रोबोट का प्रदर्शन किया। इसे यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार किया गया बताया था। खबर वायरल होते ही बात स्पष्ट हुई कि रोबोट चीन का है। यूनिवर्सिटी ने इसे इंपोर्ट किया। झूठ सामने आते ही गलगोटिया यूनिवर्सिटी की खूब किरकिरी हुई। शाम होते-होते सरकार भी लपेटे में आ गई। विश्व स्तर पर हो हल्ला हो गया।
चीनी मीडिया ने भी इस पर तीखी टिप्पणी की। परिणाम देर शाम आयोजक हरकत मंे आ गए। मामले को दबाने-छिपाने के प्रयास हुए। गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने सफाई पेश की। यूनिवर्सिटी के स्तर से जो सफाई दी जा रही है उस पर जानकार भी यकीन करने को तैयार नहीं हैं। बताया जा रहा है मंडपम से गलगोटिया यूनिवर्सिटी से स्टॉल को खाली करने को कह दिया गया है। हालांकि तब तक देश में एआई को लेकर इन दिनों मचाए जा रहे शोर में भारत की स्थिति भी स्पष्ट हो गई।
दरअसल, पिछले कुछ समय से भारत में शिक्षा बाजार के हवाले हो गई है। सरकारें भी इस बगैर कमाई के काम में अब कम रूचि ले रही हैं। सरकारी स्कूल/ कॉलेजों बंद हो रहे हैं या बंद करने के बहाने ढूंढे जा रहे हैं। जमीनों के धंधों से जुड़े लोग स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी चलाने लगे हैं। इन्हें राजाश्रय भी खूब मिल रहा है। स्कूल/कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी के धंधे में राजनीति से जुड़े लोग भी खूब हैं। दरअसल, शिक्षा के धंधे को सबसे अधिक टेंशन फ्री धंधा माना जा रहा है। ये विशुद्ध रूप से आबादी, समाज के सपनों पर आधारित धंधा है। इसमें गुणवत्ता और सवालों करने की गुंजाइश उपभोक्ता यानि समाज के पास नहीं होती।
यही वजह है कि सरकारी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी की व्यवस्थाओं को हतोत्साहित कर प्राइवेट को प्रमोट किया जा रहा है। शिक्षा का ये बाजार ज्ञान, नवाचार, शोध के बजाए प्रचार से आगे बढ़ रहे हैं। अखबारों और चैनलों में बाजारी शिक्षण संस्थाओं को शानदार तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ताजा मामला भी ऐसा ही कुछ है। गलगोदिया यूनिवर्सिटी ऐसे शिक्षण संस्थाओं के अकेली नहीं है। आपके आस-पास ऐसे तमाम प्राइवेट इंस्टीटयूट हैं। ये बात सच है कि कुछ प्राइवेट स्कूल/ कॉलेज, यूनिवर्सिटी/ इंस्टीटयूट अच्छा काम कर रहे हैं। उनके ज्ञान, नवाचार और शोध के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना हो चुकी है। मगर, अधिकांश मुनाफे का धंधा है।
धंधे में अपने खोटयुक्त प्रोडक्ट को भी रंग/ बिरंगा बनाकर बाजार में परोसा जाता है। बाजारी शिक्षा में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। बड़ी आबादी के देश और सरकारी इंस्टीटयूट में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा के चलते कुछ तो आ ही जाते हैं धोखे में। शिक्षा में ऐसा ही कुछ हो रहा है भारत देश में।
ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शिक्षा माल बन चुकी है और समाज इसका उपभोक्ता। गुरू की महिमा और गुरूकुल के महत्व को समझने वाले देश में ऐसा होना चिंता की बात है। जिम्मेदार व्यवस्था को इस पर गौर करना चाहिए। व्यवस्था से अधिक समाज को चिंतन करना चाहिए कि बाजारी शिक्षा समाज को किस दिशा में ले जा रही है।

