उत्तराखंड

देवभूमि उत्तराखंड को प्रकृति की चेतावनी

सुदीप पंचभैया।

देवभूमि उत्तराखंड को प्रकृति ने चेता दिया है। चेता दिया है कि विकास के नाम पर मनुष्य विनाश की पटकथा लिख रहा है। सीधे- सीधे कहें तो प्रकृति की विभिन्न तरह से पड़ रही मार के लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है।

प्रकृति के पास प्राणियों के जीवन के लिए सब कुछ है। पानी, हवा , अन्न, फल , दवा, सुकून देने वाले प्रकृति के नजारे और बहुत कुछ। बस प्रकृति के पास मनुष्य के लोभ लालच को पूरा करने के लिए कुछ नहीं है। यही वो बिंदु है जहां मनुष्य प्रकृति की सत्ता को चुनौति दे रहा है। मनुष्य लोभ लालच में इतना अंधा हो गया है कि वो प्रकृति का हर स्तर पर दोहन कर रहा है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। वैज्ञानिक भाषा में इसे पारिस्थितिकी असंतुलन कहा जाता है।

आधुनिक विज्ञान भी इस बात को मजबूती से रख रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम किया जाए। मगर, व्यवस्था विकास के नाम पर और आम आदमी लालच के मारे प्रकृति की व्यवस्था का कुचलने का प्रयास कर रहा है। मशीनों के दम पर किए जा रहा ये खेल अब बैक फायर करनेलगा है। विश्व भर में इसकी दुष्परिणाम देखे जाने लगे हैं। कभी अतिसय ठंड तो कभी गर्मी, कभी भारी बारिश और बाढ़ तो कभी सूखा लोगांे को परेशान कर रहा है।

कहा जा सकता है कि ये प्रकृति की चेतावनी है। ये बात अलग है कि बाढ़, भूकंप, भूस्खलन से हो रहे जान माल के नुकसान से भी मनुष्य चेतने को तैयार नहीं है। इससे संकट और बढ़ रहा है। देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों प्रकृति की मार झेल रहा है। 2013 की श्री केदार आपदा से कई गुना नुकसान इस वर्ष हो चुका है। उत्तरकाशी जिले के धराली कस्बे का निशान एक तरह से मिट गए हैं। यही हाल चमोली जिले के थराली के भी हैं। चमोली के नंदानगर भी इसी श्रेणी में है।

देहरादून जिले का सहस्त्रधारा और मालदेवता क्षेत्र में भी बड़ी तबाही हुई है। यहां कई लोगों की जान गई हैं। इसके अलावा राज्य के अधिकांश क्षेत्रों में प्रकृति की मार के घाव खासे गहरे हैं। इन्हें भरने मंे व्यवस्था को काफी समय लगेगा। हजारों करोड़ का नुकसान राज्य को हो चुका है। सड़कों का बुरा हाल है। गांवों की पगडंडियों का नामोनिशान मिट गए हैं। लोगों के घर, खेत खलिहान जमींदोज हो गए हैं। कुछ घर रहने के लायक नहीं रह गए हैं। ये घाव प्रकृति की सिर्फ चेतावनी भर हैं। इसे समझने की जरूरत है। लोगों को चेत जाना चाहिए। व्यवस्था को अपने विकास के मॉडल को बदलना चाहिए। इंजीनियरिंग के कमाल प्रकृति की व्यवस्था के मुताबिक होना चाहिए। प्रकृति को चुनौती देने वाले अंदाज में नहीं।

खास बात ये है कि भारी बारिश/ बादल फटने से अधिकांश नुकसान उन्हें क्षेत्रों में हुआ जहां गाढ़/ गधेरों, नदी/नलों के समीप बसवाट बनाई गई है। इसके अलावा हाल के सालों में बाजार के पास या सड़कों के आस-पास बसावट तेजी से बढ़ी है। इस बसावट से पहले मौके पर प्रकृति के मिजाज को देखने परखने की जरूरत महसूस नहीं की गई। भू-गर्भीय सर्वे तो अभी तक राज्य में सही तरीके से चलन में नहीं आए।

सरकारी सिस्टम भी कई बार भू-गर्भीय रिपोर्ट की अनदेखी करता रहा है। इसके दुष्परिणाम भी अक्सर देखने को मिल जाते हैं। इससे आम लोग भी भू-गर्भीय सर्वे कराने की जरूरत महसूस नहीं करते। भौगोलिक रूप से अतिसंवेदनशील उत्तराखंड में बसावट के लिए भू-गर्भीय सर्वे अनिवार्य होना चाहिए। प्राकृतिक निकासियों को चुपके से पाटकर उसे लॉन बनाने की मन स्थिति को समाप्त करना होगा। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट और तथ्यों पर गौर किया जाना चाहिए। ताकि हर बरसात में संसाधनों की बरबादी को न देखना पड़े।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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